Monday, 19 November 2012

पगड़ी का रिश्‍ता...


यहाँ बात पिछली गर्मियों की है. 

मैं हॉस्पिटल से घर आया ही था कि एक ग्रामीण अपनी भतीजी को दिखाने ले आया. अस्पताल कि भागदौड़ से परेशान था और भूख भी लग रही थी तो मैंने उस ग्रामीण को घर के सामने वाले पेड़ के नीचे बैठने के लिए कह दिया. वह सामने जाकर बैठ तो गया लेकिन 5 मिनट मैं ही लौट आया. मैं अंदर था और पापा ने गेट खोला. उसने पापा से पूछा कि डॉक्टर साब को दिखाना है ? पापा ने उसे कह कि थोड़ी देर में आयेंगे. वह चला गया पर थोड़ी ही देर में फिर लौट आया. इस बार मैं नाराज हो गए. उसे जोरदार लताड़ पिलाई . वह चुपचाप चला गया. 

बाद में खाना खाकर चेम्बर में मैंने ग्रामीण और उसकी भतीजी को बुलाया. बातचीत में पता चला की भतीजी पंजाबी में बोल रही थी और ग्रामीण शुद्ध मारवाड़ी था. दोनों के कपड़ों से भी लग रहा था की दोनों अलग-अलग देश, भाषा और संस्कृति के लोग है. मुझे पंजाबी आती नहीं और मरीज को हिंदी बोलनी नहीं आ रही थी. मैंने ग्रामीण से कह की यह क्या बोल रही है तूं बता, पर ग्रामीण की भी वही स्तिथि थी जो मेरी थी, उसे भी पंजाबी समाज में नहीं आ रही थी. अब मुझे माजरा समाज में नहीं आया. में पूछा कि ये तेरी भतीजी कैसे हुई ? तब ग्रामीण ने बताया कि करीब 30 साल पहले उस युवती के दादा बीमार होकर इलाज के लिए बीकानेर के पीबीएम अस्पताल आये थे. अस्पताल में किसी ने सरदारजी की जेब काट ली. opretion के लिए तुरंत 20 हज़ार रुपयों की जरुरत थी. मेरे पिता और इसके दादा का इलाज एक ही वार्ड में चल रहा था. 

मेरे पिता ने मौके कि नजाकत को देखते हुए अपने मित्रों की मदद से कहीं से २० हज़ार रुपये दिलाये. इलाज सफल रहा. इसके दादा अनजान शहर में ऐसे आत्मीयता के भाव देख  अपनी पगड़ी मेरे पिता के सर पर रख दी. मेरे पिता ने भी अपनी पगड़ी इसके दादा के सर पर रखकर एक नए रिश्ते की नीव रख दी. आज मेरे पिता और इसके दादा गुजर चुके है, लेकिन पगड़ी का रिश्ता आज भी वैसा ही है. इन लोगों को मारवाड़ी नहीं आती और हमें पंजाबी. उसी पगड़ी के रिश्ते की डोर ने हमें तीसरी पीढ़ी तक बाँध रखा है. 

ग्रामीण की बात सुनकर पहले तो  मैं स्तब्ध रह गया. फिर उससे किये अपने व्यवहार पर पश्चाताप होने लगा. जिस व्यक्ति को  मैं शिष्टाचार का पाठ  पढ़ाने की कोशिश कर रहा था, उसने मुझे संबंधों को निभाने का पाठ पढ़ा दिया...

दासी काका की कहानी

याददाश्‍त में कुछ बातें पड़ी रहती हैं, लेकिन वे कभी विचारों के मुख्‍य पटल पर नहीं आ पाती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियां होती हैं, जो उन्‍हें यकायक उन्‍हें महत्‍वपूर्ण बना देती है। ऐसी ही यादें दासी काका के साथ जुड़ी हैं।

यह एक जीवंत कहानी है। दासी काका और उनकी पत्‍नी की। दासी काका एक साधारण इंसान थे, एक छोटी सी दुकान, थोड़ा सा परिचय और घर से दुकान के बीच के कुछ मौन संबंध, जिन्‍हें आज की भाषा में हाय-हैलो के संबंध कह सकते हैं।

न्‍यून आमदनी वाले दासी काका की जिंदगी का यह महज एक पक्ष था, दूसरा पक्ष तब शुरू होता, जब वे दुकान से घर लौट आते। काका के लौटने से कई घंटे पहले उनके आने  की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। गर्मी के दिनों में तपी हुई छत को काकी स्‍टैण्‍ड से भरकर लाए शीतल जल से छिड़ककर ठण्‍डा करती। इसके बाद छत के बीचों बीच एक दरी बिछती, उसके बीच पाटा लगाया जाता।

शाम के झुटपुटे के साथ ही रसोई में बर्तनों का संगीत गूंजने लगता और स्‍वादिष्‍ट खाना तैयार होता, तब तक दासी काका लौट आते। वे जितनी देर सुस्‍ताने में लगाते, उतनी देर में काकी मीठा आमरस तैयार कर रही होती। उनकी गोरी अंगुलियां प्रेम की मिठास के साथ आमरस में डूबती उतराती रहती। इसके बाद एक पतले कपड़े से उन्‍हें छाना जाता। अब दासी काका छत की ओर चले जाते। काकी भी फुर्ती से नहा धोकर तैयार खाना लेकर छत पर पहुंचती। 

दासी काका जब खाना खाने बैठते तो काकी किनारे बैठकर पंखा झल रही होती। काका के  उस स्‍वर्गिक सुख की ओर मेरा ध्‍यान कभी नहीं गया। हां, एक प्रक्रिया थी, जिसे मैं अकसर देखा करता था, शादी के सालों बाद एक दिन ख्‍याल आया कि काकी ने काका को न्‍यूनतम संसाधनों के बावजूद वह स्‍वर्गिक सुख दिया, जिसकी कल्‍पना मात्र ही एक विवाहित पुरुष के लिए फंतासी है।

क्‍या आपने देखा है किसी ऐसे दासी काका को... 

Sunday, 18 November 2012

सोफिया तोलस्तोय और कस्तूरबा गाँधी

गाँधी जी के वैचारिक गुरु तोलस्तोय ने अपने पूरे जीवन को सादगी व त्याग के साथ जिया। गाँधीजी का सत्याग्रह और अहिंसा के विचार उन्ही से प्रेरित थे। गुरु शिष्य के जीवन का विहंगम अवलोकन किया जाये तो यहाँ स्पष्ट होता है की गुरु का जीवन पत्नी से मतभेद के कारण दुखद रहा और अंत भी मर्मान्तक रहा। वहीँ कस्तूरबा ने वैचारिक मतभेद के बावजूद हर परिस्तिथि में गाँधी का साथ दिया। यहाँ तक कि अपने परम्परागत विचारों और धारणाओं तक को त्याग कर गांधीमय हो गयी। 
सोफिया तोलस्तोय रूस के महान विचारक और लेखक लियो तोलस्तोय की पत्नी थी। उसने तोलस्तोय के लेखन और प्रकाशन में साथ दिया। इसके साथ ही उसे अपने 13 में से जिंदा रहे 8 बच्चों की परवरिश बेहतरीन तरीके से की। लेकिन अवस्था बढ़ने के साथ ही तोलस्तोय के विचार सादगी और आत्मबलिदान के प्रति बढ़ने लगे। सांसारिकता से दूर होते लेखक के साथ उसकी घर के प्रति जिम्मेदार पत्नी से वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे।  एक दिन तोलस्तोय ने गृहक्लेश से तंग आकर घर छोड़ दिया। भटकते हुए बीमार तोलस्तोय की घर से दूर स्‍थान पर रेलवे स्‍टेशन पर घर छोड़ने के महज दस दिन बाद ही निमोनिया से मौत हो गई। 

टॉलस्‍टॉल की तुलना में गांधी का दांपत्‍य जीवन और उनका संघर्ष देखें तो अधिक भाग्‍यशाली दिखाई देते हैं। एक ओर जहां विचारों को जन्‍म देने वाले लेखक को जीवन के शुरूआती दौर में वार एण्‍ड पीस लिखते समय अपनी पत्‍नी का पूरा साथ मिला वहीं जीवन के आखिरी दिनों में उन्‍हीं विचारों पर दृढ़ता लाने से दांपत्‍य जीवन में दरार आ गई।

दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्‍टाय फार्म पर एक अंग्रेज मित्र के पखाने को साफ करने पर हुई नोंक झोंक में जब गांधीजी ने कस्‍तूरबा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया तो, क्षणिक मतभेद के बाद बजाय विद्रोह के पारंपरिक भारतीय नारी ने अपर्न पति के विचारों को आत्‍मसात कर लिया। यही बाद में गांधीजी ताकत बन गई। जीवन के अंत तक कस्‍तूबा ने गांधीजी का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। भले ही गांधीजी का दांपत्‍य जीवन सुखी रहा होगा, लेकिन पारिवारिक जीवन उतना सफल नही रहा। पूरी जिंदगी गांधी मदिरा निषेध का प्रचार करते रहे। लेकिन मृत्‍यु के बाद उनके पुत्र ने मुखाग्नि देते समय मदिरा पान कर रखा था।

कुल 48 साल लंबे वैवाहिक जीवन के बावजूद अपने विचारों पर दृढ़ सोफिया पति से असहमति रखते हुए अपने बच्‍चों के हितों पर ध्‍यान दिया। तो कस्‍तूरबा अपने पति के साथ हर संघर्ष कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूं कि एक पत्‍नी द्वारा अपने पति के विचारों के लिए खुद के विचारों का बलिदान कर पति के विचारों को आत्‍मसात करना उचित है क्‍या...