Sunday, 18 November 2012

सोफिया तोलस्तोय और कस्तूरबा गाँधी

गाँधी जी के वैचारिक गुरु तोलस्तोय ने अपने पूरे जीवन को सादगी व त्याग के साथ जिया। गाँधीजी का सत्याग्रह और अहिंसा के विचार उन्ही से प्रेरित थे। गुरु शिष्य के जीवन का विहंगम अवलोकन किया जाये तो यहाँ स्पष्ट होता है की गुरु का जीवन पत्नी से मतभेद के कारण दुखद रहा और अंत भी मर्मान्तक रहा। वहीँ कस्तूरबा ने वैचारिक मतभेद के बावजूद हर परिस्तिथि में गाँधी का साथ दिया। यहाँ तक कि अपने परम्परागत विचारों और धारणाओं तक को त्याग कर गांधीमय हो गयी। 
सोफिया तोलस्तोय रूस के महान विचारक और लेखक लियो तोलस्तोय की पत्नी थी। उसने तोलस्तोय के लेखन और प्रकाशन में साथ दिया। इसके साथ ही उसे अपने 13 में से जिंदा रहे 8 बच्चों की परवरिश बेहतरीन तरीके से की। लेकिन अवस्था बढ़ने के साथ ही तोलस्तोय के विचार सादगी और आत्मबलिदान के प्रति बढ़ने लगे। सांसारिकता से दूर होते लेखक के साथ उसकी घर के प्रति जिम्मेदार पत्नी से वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे।  एक दिन तोलस्तोय ने गृहक्लेश से तंग आकर घर छोड़ दिया। भटकते हुए बीमार तोलस्तोय की घर से दूर स्‍थान पर रेलवे स्‍टेशन पर घर छोड़ने के महज दस दिन बाद ही निमोनिया से मौत हो गई। 

टॉलस्‍टॉल की तुलना में गांधी का दांपत्‍य जीवन और उनका संघर्ष देखें तो अधिक भाग्‍यशाली दिखाई देते हैं। एक ओर जहां विचारों को जन्‍म देने वाले लेखक को जीवन के शुरूआती दौर में वार एण्‍ड पीस लिखते समय अपनी पत्‍नी का पूरा साथ मिला वहीं जीवन के आखिरी दिनों में उन्‍हीं विचारों पर दृढ़ता लाने से दांपत्‍य जीवन में दरार आ गई।

दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्‍टाय फार्म पर एक अंग्रेज मित्र के पखाने को साफ करने पर हुई नोंक झोंक में जब गांधीजी ने कस्‍तूरबा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया तो, क्षणिक मतभेद के बाद बजाय विद्रोह के पारंपरिक भारतीय नारी ने अपर्न पति के विचारों को आत्‍मसात कर लिया। यही बाद में गांधीजी ताकत बन गई। जीवन के अंत तक कस्‍तूबा ने गांधीजी का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। भले ही गांधीजी का दांपत्‍य जीवन सुखी रहा होगा, लेकिन पारिवारिक जीवन उतना सफल नही रहा। पूरी जिंदगी गांधी मदिरा निषेध का प्रचार करते रहे। लेकिन मृत्‍यु के बाद उनके पुत्र ने मुखाग्नि देते समय मदिरा पान कर रखा था।

कुल 48 साल लंबे वैवाहिक जीवन के बावजूद अपने विचारों पर दृढ़ सोफिया पति से असहमति रखते हुए अपने बच्‍चों के हितों पर ध्‍यान दिया। तो कस्‍तूरबा अपने पति के साथ हर संघर्ष कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूं कि एक पत्‍नी द्वारा अपने पति के विचारों के लिए खुद के विचारों का बलिदान कर पति के विचारों को आत्‍मसात करना उचित है क्‍या...

2 comments:

  1. Your posts will certainly enrich Hindi blogging. Your question presumes that Gandhi or any such great personality did not imbibe his partner's thoughts. Some facts remain hidden for always. Gents' part is visible because they are at fore front. Now when ladies also are on same platform, surely such aspects will be highlighted.
    You must have read 'Na Hanyate' based on real story of the lady author. Think about her husband.

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  2. पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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