Monday, 19 November 2012

दासी काका की कहानी

याददाश्‍त में कुछ बातें पड़ी रहती हैं, लेकिन वे कभी विचारों के मुख्‍य पटल पर नहीं आ पाती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियां होती हैं, जो उन्‍हें यकायक उन्‍हें महत्‍वपूर्ण बना देती है। ऐसी ही यादें दासी काका के साथ जुड़ी हैं।

यह एक जीवंत कहानी है। दासी काका और उनकी पत्‍नी की। दासी काका एक साधारण इंसान थे, एक छोटी सी दुकान, थोड़ा सा परिचय और घर से दुकान के बीच के कुछ मौन संबंध, जिन्‍हें आज की भाषा में हाय-हैलो के संबंध कह सकते हैं।

न्‍यून आमदनी वाले दासी काका की जिंदगी का यह महज एक पक्ष था, दूसरा पक्ष तब शुरू होता, जब वे दुकान से घर लौट आते। काका के लौटने से कई घंटे पहले उनके आने  की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। गर्मी के दिनों में तपी हुई छत को काकी स्‍टैण्‍ड से भरकर लाए शीतल जल से छिड़ककर ठण्‍डा करती। इसके बाद छत के बीचों बीच एक दरी बिछती, उसके बीच पाटा लगाया जाता।

शाम के झुटपुटे के साथ ही रसोई में बर्तनों का संगीत गूंजने लगता और स्‍वादिष्‍ट खाना तैयार होता, तब तक दासी काका लौट आते। वे जितनी देर सुस्‍ताने में लगाते, उतनी देर में काकी मीठा आमरस तैयार कर रही होती। उनकी गोरी अंगुलियां प्रेम की मिठास के साथ आमरस में डूबती उतराती रहती। इसके बाद एक पतले कपड़े से उन्‍हें छाना जाता। अब दासी काका छत की ओर चले जाते। काकी भी फुर्ती से नहा धोकर तैयार खाना लेकर छत पर पहुंचती। 

दासी काका जब खाना खाने बैठते तो काकी किनारे बैठकर पंखा झल रही होती। काका के  उस स्‍वर्गिक सुख की ओर मेरा ध्‍यान कभी नहीं गया। हां, एक प्रक्रिया थी, जिसे मैं अकसर देखा करता था, शादी के सालों बाद एक दिन ख्‍याल आया कि काकी ने काका को न्‍यूनतम संसाधनों के बावजूद वह स्‍वर्गिक सुख दिया, जिसकी कल्‍पना मात्र ही एक विवाहित पुरुष के लिए फंतासी है।

क्‍या आपने देखा है किसी ऐसे दासी काका को... 

2 comments:

  1. बहुत ही मर्मस्पर्शी और दिल की गहराइयों को छूने वाला शब्द-चित्र.
    लेखक के इस नए रूप से परिचय करवाने और साझा करने के लिए प्रिय सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी का साधुवाद.

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  2. I know personally to Dasi Kaka and My bua (Kaki)but the way you describe is so interesting
    great

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